Rishi Panchami 2019, Vrat Vidhi, Katha

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ऋषि पंचमी – महत्व और उत्सव
ऋषि पंचमी हिंदू धर्म में एक शुभ त्यौहार है। ऐसा माना जाता है कि यह दिन भारत के ऋषियों का सम्मान करने के लिए है। ऋषि पंचमी का अवसर मुख्य रूप से सप्तर्षि के रूप में सम्मानित सात महान ऋषियों को समर्पित है। पंचमी शब्द पांचवें दिन का प्रतिनिधित्व करता है और ऋषि का प्रतीक है। इस प्रकार, ‘ऋषि पंचमी’ का पवित्र दिन महान भारतीय ऋषियों की यादों को दर्शाता है। यह शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन (पंचमी तीथी) पर भद्रपद महीने में मनाया जाता है। आम तौर पर, यह त्यौहार गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद मनाया जाता है और हरतालिका तीज के दो दिन बाद।

यह त्यौहार सप्तर्षि से जुड़ा हुआ है जो सात ऋषि हैं जिन्होंने पृथ्वी से बुराई को खत्म करने के लिए अपने जीवन का त्याग किया और मानव जाति के सुधार के लिए काम किया। ये महान ऋषि सिद्धांतबद्ध और अत्यधिक धार्मिक थे और उन्होंने अपने भक्तों को भलाई और मानवता का मार्ग लेना सिखाया। हिंदू मान्यताओं और शास्त्रों में, यह उल्लेख किया गया है कि ये संत अपने भक्तों को अपने ज्ञान और बुद्धि से शिक्षित करते हैं ताकि हर कोई दान, मानवता और ज्ञान के मार्ग का पालन कर सके।

ऋषि पंचमी कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार, ऋषि पंचमी का हिंदू त्यौहार भद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन (पंचमी तीथी) पर मनाया जाता है।

ऋषि पंचमी की कहानी

विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी, जिसका नाम सुशीला था। उस ब्राह्मण के एक पुत्र तथा एक पुत्री दो संतान थी। विवाह योग्य होने पर उसने समान कुलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया। दैवयोग से कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई। दुखी ब्राह्मण दम्पति कन्या सहित गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे।
एक दिन ब्राह्मण कन्या सो रही थी कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया। कन्या ने सारी बात मां से कही। मां ने पति से सब कहते हुए पूछा- प्राणनाथ! मेरी साध्वी कन्या की यह गति होने का क्या कारण है? उत्तंक ने समाधि द्वारा इस घटना का पता लगाकर बताया- पूर्व जन्म में भी यह कन्या ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू दिए थे। इस जन्म में भी इसने लोगों की देखा-देखी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं।
धर्म-शास्त्रों की मान्यता है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी। पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्त हो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला।

ऋषि पंचमी व्रत की विधि
इस दिन व्रत रखने वाली महिलाओं को सुबह सूरज निकलने से पहले उठकर स्नान कर साफ वस्त्र पहन लेने चाहिए। इसके बाद घर को गोबर से लिपा जाता है। फिर सप्तऋषि और देवी अरुंधती की प्रतिमा बनाई जाती है। इसके बाद उस प्रतिमा और कलश की स्थापना कर सप्तऋषि की कथा सुनी जाती है। इस दिन महिलाएं बोया हुआ अनाज न खाकर पसई धान के चावल खाती हैं।

 

 

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